



श्रीमहन्त नारायण गिरि महाराज से हुई आत्मीय भेंट एवं सनातन धर्म, संत परंपरा और तीर्थों के संरक्षण पर विशेष धर्मचर्चा
गाजियाबाद, 4 अक्टूबर 2026। राजस्थान के बालोतरा जनपद स्थित प्रसिद्ध श्री ब्रह्मधाम तीर्थ, आसोतरा की पावन संत परंपरा के ब्रह्मर्षि श्री तुलसाराम महाराज अपनी अखिल भारतीय तीर्थयात्रा के क्रम में रविवार को अति प्राचीन सिद्धपीठ श्री दूधेश्वर नाथ मठ महादेव मंदिर, गाजियाबाद पधारे। मंदिर पहुंचने पर उनका वैदिक परंपरा, बैंड-बाजों और अत्यंत श्रद्धा-उत्साह के साथ भव्य स्वागत किया गया।
महाराज के आगमन पर सिद्धपीठ श्री दूधेश्वर नाथ मठ महादेव मंदिर के पीठाधीश्वर एवं श्री पंचदशनाम जूना अखाड़ा के अंतरराष्ट्रीय प्रवक्ता श्रीमहन्त नारायण गिरि महाराज ने उनका आत्मीय अभिनंदन किया। मंदिर के आचार्यों, श्री दूधेश्वर वेद विद्यापीठ के विद्यार्थियों एवं श्रद्धालुओं ने वैदिक मंत्रोच्चार के बीच महाराज का स्वागत किया। बैंड-बाजों के साथ भव्य स्वागत यात्रा निकाली गई, जिससे पूरा वातावरण धर्ममय और भक्तिमय हो उठा।मंदिर पहुंचने के पश्चात ब्रह्मर्षि श्री तुलसाराम महाराज ने सर्वप्रथम भगवान श्री दूधेश्वर नाथ महादेव के स्वयंभू शिवलिंग का विधि-विधान से पूजन, जलाभिषेक एवं रुद्राभिषेक किया। उन्होंने भगवान श्री दूधेश्वर नाथ से सनातन धर्म की उन्नति, राष्ट्र की सुख-समृद्धि, विश्व कल्याण और सभी श्रद्धालुओं के मंगल की प्रार्थना की।दो महान संत परंपराओं का संगम बनी धर्मचर्चापूजन-अभिषेक के उपरांत ब्रह्मर्षि श्री तुलसाराम महाराज एवं सिद्धपीठ श्री दूधेश्वर नाथ मठ महादेव मंदिर के पीठाधीश्वर श्रीमहन्त नारायण गिरि महाराज के मध्य अत्यंत आत्मीय, गंभीर और आध्यात्मिक धर्मचर्चा हुई। यह संत मिलन केवल औपचारिक भेंट नहीं, बल्कि राजस्थान की तप, साधना और ब्रह्मधाम परंपरा तथा भगवान दूधेश्वर नाथ की प्राचीन सिद्ध-संत परंपरा का पावन संगम बन गया।दोनों संतों ने वर्तमान समय में सनातन धर्म के समक्ष उपस्थित चुनौतियों, सनातन संस्कृति के संरक्षण, तीर्थों एवं प्राचीन मंदिरों की मर्यादा, गौ-संरक्षण, वेद-संस्कृत शिक्षा, संतों की सामाजिक जिम्मेदारी तथा युवा पीढ़ी को धर्म और संस्कारों से जोड़ने की आवश्यकता पर विस्तार से विचार-विमर्श किया।धर्मचर्चा में यह भाव प्रमुख रूप से सामने आया कि सनातन धर्म केवल पूजा-पद्धति का नाम नहीं, बल्कि जीवन को सत्य, संयम, सेवा, करुणा, त्याग और परोपकार से जोड़ने वाली शाश्वत जीवन-पद्धति है। मंदिर केवल देव-दर्शन का स्थान नहीं, बल्कि समाज में संस्कार, सेवा और आध्यात्मिक चेतना जगाने वाले केंद्र हैं। इसी प्रकार तीर्थ केवल भौगोलिक स्थान नहीं होते; वे ऋषियों की तपस्या, संतों की साधना और असंख्य पीढ़ियों की श्रद्धा से निर्मित जीवंत आध्यात्मिक धरोहर हैं।श्रीमहन्त नारायण गिरि महाराज ने कहा कि भारत की आत्मा उसके तीर्थों में बसती है और भारत की चेतना उसके संतों में प्रवाहित होती है। बद्रीनाथ से रामेश्वरम्, जगन्नाथ पुरी से द्वारका और गंगोत्री-हरिद्वार से लेकर देश के छोटे-बड़े सिद्ध तीर्थों तक एक ही सनातन चेतना प्रवाहित हो रही है। संत जब इन तीर्थों की यात्रा करते हैं तो वे केवल स्वयं दर्शन नहीं करते, बल्कि समाज को अपनी जड़ों, अपने धर्म और अपनी गौरवशाली परंपरा से जुड़ने का संदेश देते हैं।ब्रह्मर्षि श्री तुलसाराम महाराज ने भी तीर्थयात्रा की आध्यात्मिक महत्ता पर प्रकाश डालते हुए भाव व्यक्त किया कि तीर्थयात्रा मनुष्य की बाहरी यात्रा के साथ-साथ उसकी अंतर्यात्रा भी है। तीर्थ मनुष्य के भीतर श्रद्धा को दृढ़ करते हैं, अहंकार को कम करते हैं और उसे सेवा, साधना तथा ईश्वर के प्रति समर्पण की ओर ले जाते हैं। भारत के विभिन्न तीर्थ भले ही अलग-अलग प्रदेशों में स्थित हों, किंतु सभी का मूल संदेश एक है—धर्म की रक्षा, मानवता की सेवा और परमात्मा की प्राप्ति।दोनों संतों के मध्य विशेष रूप से इस बात पर भी चर्चा हुई कि आने वाली पीढ़ी को केवल आधुनिक शिक्षा देना पर्याप्त नहीं है। बच्चों और युवाओं को वेद, उपनिषद, श्रीमद्भगवद्गीता, रामायण, संत साहित्य, भारतीय इतिहास, गुरु परंपरा तथा माता-पिता और राष्ट्र के प्रति कर्तव्य का ज्ञान भी दिया जाना चाहिए। संस्कारवान युवा ही सशक्त समाज और सशक्त राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं।श्रीमहन्त नारायण गिरि महाराज ने कहा कि संत समाज का दायित्व केवल मठ-मंदिरों तक सीमित नहीं है। जहां धर्म पर संकट हो, जहां समाज को दिशा की आवश्यकता हो, जहां गौ, गंगा, मंदिर, तीर्थ और संस्कृति के संरक्षण का प्रश्न हो, वहां संत समाज को समाज का मार्गदर्शन करना चाहिए। संत का जीवन स्वयं के लिए नहीं, बल्कि लोकमंगल के लिए होता है।धर्मचर्चा में गौमाता की सेवा और संरक्षण को भी सनातन संस्कृति का अभिन्न अंग बताया गया। दोनों संतों ने समाज से आह्वान किया कि धर्म को केवल पर्व और उत्सव तक सीमित न रखकर उसे दैनिक जीवन के आचरण में उतारा जाए। माता-पिता की सेवा, गौसेवा, जरूरतमंद की सहायता, पर्यावरण एवं जलस्रोतों की रक्षा और अपने तीर्थों की पवित्रता बनाए रखना भी धर्माचरण का ही स्वरूप है।अखिल भारतीय तीर्थयात्रा—देश की आध्यात्मिक एकता का संदेशब्रह्मर्षि श्री तुलसाराम महाराज लगभग 60 श्रद्धालु पुरुष यात्रियों के साथ बसों द्वारा अखिल भारतीय तीर्थयात्रा कर रहे हैं। इस यात्रा के अंतर्गत चार धाम सहित देश के लगभग 68 प्रमुख तीर्थों, प्राचीन मंदिरों, पवित्र सरोवरों, कुंडों एवं वैदिक-सनातन परंपरा से जुड़े धर्मस्थलों के दर्शन-पूजन का संकल्प है।महाराज ने वृंदावन में लगभग दो माह चातुर्मास एवं साधना की। इसके बाद वे हरिद्वार पहुंचे और वहां से गाजियाबाद स्थित सिद्धपीठ श्री दूधेश्वर नाथ मठ महादेव मंदिर में भगवान दूधेश्वर नाथ का अभिषेक-पूजन करने पधारे। गाजियाबाद के बाद उनका दिल्ली तथा आगे देश के अन्य प्रमुख तीर्थों की ओर प्रस्थान का कार्यक्रम है। यात्रा पूर्ण कर 26 अक्टूबर 2026 को श्री ब्रह्मधाम तीर्थ, आसोतरा, बालोतरा, राजस्थान पहुंचने का कार्यक्रम है।इस अवसर पर गाजियाबाद के विधायक श्री संजीव शर्मा, विश्व हिंदू परिषद के धर्माचार्य एवं संत संपर्क से जुड़े श्री अशोक तिवारी, महानगर अध्यक्ष श्री अनिल गर्ग सांवरिया, श्री राजकुमार डूंगर, विश्व हिंदू परिषद मेरठ प्रांत तथा राजपुरोहित समाज के प्रतिनिधियों सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और महाराज का अभिनंदन कर आशीर्वाद प्राप्त किया।श्रीमहन्त नारायण गिरि महाराज ने ब्रह्मर्षि श्री तुलसाराम महाराज की अखिल भारतीय तीर्थयात्रा की सफलता की मंगलकामना करते हुए कहा कि “जब संत चलते हैं तो उनके साथ केवल यात्री नहीं चलते, बल्कि धर्म का संदेश चलता है; जब संत तीर्थों को जोड़ते हैं तो भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक एकता और अधिक सुदृढ़ होती है।”संतों की इस आत्मीय धर्मचर्चा ने उपस्थित श्रद्धालुओं को भी गहराई से प्रभावित किया। दोनों संतों ने अंत में भगवान श्री दूधेश्वर नाथ महादेव से राष्ट्र की एकता-अखंडता, सनातन धर्म की उन्नति, गौ-गंगा और तीर्थों की रक्षा, संत समाज की एकजुटता तथा विश्व में शांति और कल्याण की प्रार्थना की।पिंटू सुथार मीडिया प्रभारी दूधेश्वर नाथ मंदिर गाजियाबाद उत्तर प्रदेश
