
गाजियाबाद। प्रतिवर्ष 2 अक्टूबर को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती मनाई जाती है। यह दिन भारत ही नहीं, बल्कि विश्व स्तर पर शांति, अहिंसा और सत्य के विचारों को स्मरण करने का अवसर है। संयुक्त राष्ट्र ने 2 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रूप में मान्यता दी है। गांधी जयंती केवल महात्मा गांधी को याद करने का दिन नहीं, बल्कि उनके विचारों और सिद्धांतों को जीवन में उतारने का अवसर भी है।महात्मा गांधी ने सत्य और अहिंसा को अपने संघर्ष का आधार बनाया। उन्होंने दुनिया को यह संदेश दिया कि बड़े से बड़े बदलाव के लिए हिंसा का सहारा लेना जरूरी नहीं है। सत्याग्रह और अहिंसक आंदोलनों के माध्यम से उन्होंने लोगों को संगठित किया और स्वतंत्रता आंदोलन में व्यापक जनभागीदारी को बढ़ावा दिया। उनके विचारों का प्रभाव भारत की सीमाओं से बाहर भी दिखाई दिया।गांधीजी का जीवन सादगी, आत्मनिर्भरता और सामाजिक समानता के विचारों से जुड़ा रहा। उनका चरखा स्वदेशी और आत्मनिर्भरता का प्रतीक बना। वे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ाने पर जोर देते थे। उनका मानना था कि देश की प्रगति तभी सार्थक होगी, जब समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास का लाभ पहुंचे।स्वच्छता को लेकर भी गांधीजी का विशेष आग्रह था। वे व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन में स्वच्छता को महत्वपूर्ण मानते थे। आज भी स्वच्छता के प्रति जागरूकता बढ़ाने वाले अभियानों में गांधीजी के विचारों का उल्लेख किया जाता है।गांधीजी सामाजिक भेदभाव के विरोधी थे और समाज में समानता, भाईचारे तथा आपसी सम्मान के पक्षधर रहे। उनका मानना था कि समाज की मजबूती लोगों के बीच सहयोग, संवेदना और विश्वास से बनती है।आज के दौर में जब समाज विभिन्न प्रकार के तनाव, मतभेद और चुनौतियों का सामना कर रहा है, गांधीजी के सत्य, अहिंसा, सादगी और सह-अस्तित्व के विचार प्रासंगिक बने हुए हैं। गांधी जयंती हमें यह संदेश देती है कि सकारात्मक बदलाव की शुरुआत दूसरों से अपेक्षा करने के बजाय स्वयं से की जा सकती है। अपने व्यवहार में सत्य, संयम, स्वच्छता और संवेदनशीलता को स्थान देकर समाज में सकारात्मक परिवर्तन की दिशा मजबूत की जा सकती है। यही गांधी जयंती के संदेश को सार्थक रूप से अपनाने का प्रयास होगा।लेखक: सुखमन सिंह

