रावल किशन सिंह जसोल ने वैदिक परंपरा अनुसार तिलक कर चादर ओढ़ाई

जसोल। बालोतरा
मरुधरा की पावन तपोभूमि जसोल स्थित प्राचीन, पवित्र एवं सिद्धपीठ श्री नर्बदेश्वर महादेव मंदिर में ब्रह्मलीन परम पूज्य श्री श्री 1008 श्री संध्यापुरी जी महाराज के ब्रह्मलीन होने के उपरांत परंपरा के अनुरूप महंत पद महोत्सव का भव्य, गरिमामय एवं आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण आयोजन अत्यंत श्रद्धा एवं उल्लास के साथ संपन्न हुआ।

यह आयोजन धार्मिक परंपरा के निर्वहन के साथ-साथ सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक विरासत, लोक परंपरा तथा पर्यावरणीय चेतना का अद्वितीय संगम सिद्ध हुआ। संपूर्ण क्षेत्र भक्तिरस, आध्यात्मिक ऊर्जा एवं धार्मिक आस्था से ओतप्रोत हो उठा।

इस पावन अवसर पर जूना अखाड़ा के अंतरराष्ट्रीय प्रवक्ता, दिल्ली-एनसीआर संत महामंडल के अध्यक्ष एवं श्री दूधेश्वर महादेव मंदिर, गाजियाबाद के महंत परम पूज्य श्री नारायण गिरी जी महाराज, पूज्य श्री शंभूवन जी महाराज (श्री दूधेश्वर महादेव मठ, टापरा), पूज्य श्री बालकवन जी महाराज (जागसा मठ) सहित अनेक संत-महात्माओं के पावन सान्निध्य में श्री रावल मल्लीनाथ जी के वंशज एवं उनके 25वें गादीपति श्री रावल किशन सिंह जी जसोल द्वारा वैदिक मंत्रोच्चार, पारंपरिक विधि-विधान एवं धार्मिक मर्यादाओं के अनुरूप तिलक कर एवं चादर ओढ़ाकर पूज्य श्री गणेशपुरी जी महाराज महंत पद की पावन गादी पर विराजमान हुए।

इस अवसर पर उपस्थित श्रद्धालुओं ने “हर-हर महादेव” एवं “जय श्री नर्बदेश्वर भगवान” के गगनभेदी जयघोषों से संपूर्ण वातावरण को पूर्णतः भक्तिमय बना दिया।

आस्था, संस्कृति एवं परंपरा का अद्भुत संगम

महंत पद समारोह अत्यंत श्रद्धा, उल्लास एवं गरिमा के साथ सम्पन्न हुआ। जसोल सर्वसमाज सहित आसपास के भाईपा ग्रामों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु, गणमान्य नागरिक एवं समाज के प्रबुद्धजन इस दिव्य आयोजन के साक्षी बने।

कार्यक्रम में पारंपरिक लोक संस्कृति की अनुपम छटा देखने को मिली। घुड़ नृत्य, गैर नृत्य, पुष्कर से आए ख्याति प्राप्त नगारची कलाकारों तथा स्थानीय दमामी कलाकारों की मनोहारी प्रस्तुतियों ने उपस्थित जनसमूह को मंत्रमुग्ध कर दिया।

संपूर्ण वातावरण भक्तिरस, उत्साह एवं आध्यात्मिक चेतना से ओतप्रोत रहा।

महंत श्री नारायण गिरी जी महाराज के आशीर्वचन

महंत श्री नारायण गिरी जी महाराज ने अपने आशीर्वचन में कहा कि श्री नर्बदेश्वर महादेव की यह भूमि एक सिद्धपीठ है, जहाँ अनादिकाल से साधना, तपस्या एवं आध्यात्मिक चेतना का प्रवाह निरंतर बना हुआ है। संत परंपरा भारतीय संस्कृति की आत्मा है तथा धर्म समाज को एक सूत्र में बाँधने का आधार है।

उन्होंने कहा कि यह वास्तव में अत्यंत पावन एवं सुंदर समय है, जो हमारे समक्ष उपस्थित है और आने वाला समय और अधिक महत्वपूर्ण होने वाला है। आने वाले समय में जल, जीवन, हरियाली और वन-संपदा का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। जल, वन और पर्यावरण की सुरक्षा से देश, संस्कृति और जीवन का सार सुरक्षित रहता है। वर्तमान समय में पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता अत्यधिक बढ़ गई है और यह हम सभी का सामूहिक दायित्व है कि हम इस दिशा में जागरूक होकर कार्य करें।

यह स्थान स्वयं में एक सिद्ध एवं पवित्र भूमि है। प्राचीन काल से ही यहाँ दिव्य शक्तियों का वास रहा है। यहाँ स्वयंभू महादेव विराजमान हैं, सिद्ध गुरु-मूर्ति विराजमान हैं तथा अनेक दिव्य चेतनाएँ इस स्थल को पवित्र बनाती हैं। यहाँ स्थापित सभी मूर्तियाँ चेतन एवं सिद्ध मानी जाती हैं, जिनका अपना दिव्य प्रभाव है। हमारे आचार्यगणों को भी यहाँ रात्रि के समय अनेक सिद्धों के दर्शन हुए हैं। यह एक सिद्ध साधना स्थल है, जहाँ केवल साधना में लीन संत ही स्थिर रह सकते हैं। सामान्य व्यक्ति के लिए यहाँ टिक पाना कठिन होता है, यह संतों की तपस्या और उनकी आंतरिक शक्ति का ही परिणाम है कि वे यहाँ निवास कर पाते हैं।

हमारे पूज्य श्री गणेशपुरी जी महाराज ने सदैव इस स्थान को अपनी साधना का केंद्र माना है। वे अनेक बार यहाँ पधारे और उन्होंने स्वयं कहा कि उन्हें यहाँ स्थापित करने की प्रेरणा परंपरा और गुरु-कृपा से प्राप्त हुई है। यह स्थान प्राचीन काल से रावलगढ़ की परंपरा से जुड़ा हुआ है तथा मंदिर की व्यवस्था भी उसी परंपरा के अनुसार संचालित होती रही है। रावलगढ़ से संबंधित इस मंदिर की व्यवस्था में सदैव श्रद्धा और सेवा का भाव रहा है। श्री राणीसा भटियाणीसा भी इस स्थान पर ईश्वर रूप में महादेव की उपासना करती थीं, जिससे इस स्थल की महत्ता और अधिक बढ़ जाती है। यह स्थान वास्तव में एक दिव्य, सिद्ध और आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण क्षेत्र है।

हम सभी भली-भांति जानते हैं कि धर्म ही वह आधार है, जो पूरे भारतवर्ष को एक सूत्र में बाँध सकता है। जगद्गुरु आदि शंकराचार्य जी ने मात्र बत्तीस वर्ष की आयु में संपूर्ण भारत का भ्रमण कर धर्म की पुनर्स्थापना की। उन्होंने देश के चारों दिशाओं में चार प्रमुख मठों की स्थापना की—दक्षिण में श्रृंगेरी मठ, उत्तर में ज्योतिर्पीठ, पश्चिम में शारदा पीठ (द्वारका) तथा पूर्व में गोवर्धन पीठ (पुरी)। उनके माध्यम से धर्म, ज्ञान और संस्कृति का प्रसार हुआ तथा भारत एक आध्यात्मिक सूत्र में बंधा। उनके शिष्यों द्वारा दशनामी परंपरा का विस्तार हुआ।

हमारे संतों का भाव सदैव सेवा और समर्पण का रहा है। “अन्नदाता सदा सुखी भव” की भावना के साथ समाज की सेवा को धर्म माना गया है। हाल ही श्री रावल मल्लीनाथ पशु मेले के दौरान में महंत श्री गणेश पूरी जी महाराज के पावन सानिध्य में श्री राणी भटियाणी मंदिर संस्थान, जसोल द्वारा निःशुल्क आयोजित भोजनशाला में लगभग तीस हजार श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया, जो सेवा, समर्पण और संगठन का उत्कृष्ट उदाहरण है। पूज्य महाराज जी का संकल्प है कि यहाँ राम रसोड़ा के रूप में सेवा कार्य का विस्तार किया जाए, जिससे आने वाले प्रत्येक श्रद्धालु को भोजन एवं सेवा प्राप्त हो सके। भविष्य में यह स्थान एक बड़े विद्यापीठ के रूप में भी विकसित हो सकता है।

हमारी परंपरा के अनुसार सम्मान और व्यवस्था का एक निश्चित स्वरूप होता है। संतों के प्रति सदैव विनम्र निवेदन किया जाता है। संत समाज का सम्मान, गुरु परंपरा का आदर और सभी की भावनाओं का संरक्षण करना हमारा कर्तव्य है। यही हमारी संस्कृति है, यही हमारी पहचान है और यही वह मार्ग है, जिस पर चलकर हम अपने धर्म, समाज और राष्ट्र की सेवा कर सकते हैं।

रावल किशन सिंह जसोल ने अपने उद्बोधन की शुरुआत श्री नर्बदेश्वर महादेव के श्रीचरणों में नमन करते हुए ब्रह्मलीन संत श्री संध्यापुरी जी महाराज, पूज्य श्री नारायणगिरि जी महाराज, श्री गणेशपुरी जी महाराज, श्री शंभूवन जी महाराज, श्री बालकवन जी महाराज तथा उपस्थित समस्त संत-महात्माओं, साधु-संतों एवं श्रद्धालु बंधुओं को सादर प्रणाम किया। जसोल सर्वसमाज सहित आसपास के विभिन्न ग्रामों—असाड़ा, जागसा, बुडीवाड़ा, टापरा, वेदरलाई, कालेवा आदि—से पधारे सभी श्रद्धालुओं का हार्दिक स्वागत एवं अभिनंदन करते हुए उन्होंने अपनी कृतज्ञता व्यक्त की।

उन्होंने कहा कि यह स्थान अत्यंत प्राचीन, पवित्र एवं सिद्धपीठ है, जहाँ अनेक संत-महात्माओं ने तपस्या कर इस भूमि को दिव्यता प्रदान की है। यह मंदिर एक जीवंत आध्यात्मिक केंद्र है।

उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में आध्यात्मिकता के साथ ज्ञान एवं विज्ञान का समन्वय आवश्यक है। आधुनिक शिक्षा, अनुसंधान एवं नवाचार समाज के समग्र विकास के लिए अनिवार्य हैं।

उन्होंने पर्यावरण संरक्षण पर विशेष बल देते हुए कहा कि भगवान शिव स्वयं प्रकृति के प्रतीक हैं, अतः प्रकृति की रक्षा करना ही सच्ची ईश्वर-आराधना है।

उन्होंने कहा कि ओरन (गोचर भूमि), तालाब, बावड़ियाँ एवं जल स्रोतों का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। अतिक्रमण एवं उपेक्षा के कारण इनका नष्ट होना अत्यंत चिंता का विषय है।

उन्होंने गौसंरक्षण, पशुधन विकास एवं प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपयोग पर बल दिया।

उन्होंने कहा कि जीवन अत्यंत अनमोल है और इसे सेवा, साधना एवं समाजहित के कार्यों में लगाना चाहिए।

कुंवर हरिशचंद्र सिंह जसोल ने कहा कि जसोल एवं आसपास का क्षेत्र प्राचीन काल से ही संतों की तपोभूमि रहा है, जहाँ की आध्यात्मिक परंपरा अत्यंत समृद्ध एवं गौरवशाली है।

उन्होंने पर्यावरण संरक्षण को वर्तमान समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बताते हुए कहा कि जल ही जीवन का आधार है और इसके संरक्षण के बिना विकास की कल्पना अधूरी है।

उन्होंने तालाब, आगोर, बावड़ियों एवं ओरन (गोचर भूमि) के संरक्षण पर विशेष बल देते हुए कहा कि यह हमारी सांस्कृतिक धरोहर के साथ-साथ प्राकृतिक संतुलन के आधार हैं।

उन्होंने बताया कि संतों की प्रेरणा से क्षेत्र में जल संरक्षण, तालाबों के जीर्णोद्धार, नए जल स्रोतों के निर्माण तथा व्यापक वृक्षारोपण के कार्य निरंतर किए जा रहे हैं, जो भविष्य में एक आदर्श मॉडल के रूप में स्थापित होंगे।

उन्होंने युवाओं का आह्वान करते हुए कहा कि वे धर्म, संस्कृति एवं पर्यावरण संरक्षण के कार्यों में सक्रिय भागीदारी निभाएं और समाज निर्माण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका सुनिश्चित करें।

महंत श्री गणेशपुरी जी महाराज के आशीर्वचन

महंत पद पर आसीन होने के उपरांत पूज्य श्री गणेशपुरी जी महाराज ने अत्यंत विनम्र भाव से अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि वे वाणी से अधिक कर्म में विश्वास रखते हैं।

उन्होंने कहा कि मनुष्य से भूल होना स्वाभाविक है, किंतु सच्चा साधक वही है, जो अपनी भूल को पहचानकर उसे सुधारने का प्रयास करता है।

उन्होंने अपने जीवन के अनुभव साझा करते हुए बताया कि उन्हें महाराष्ट्र, गुजरात एवं मध्यप्रदेश जैसे विभिन्न राज्यों में सेवा एवं साधना का अवसर प्राप्त हुआ और अंततः ईश्वर की कृपा से वे मालाणी की इस पावन भूमि पर सेवा के लिए आए।

उन्होंने कहा कि धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धता, सेवा, साधना और आत्मानुशासन का विषय है।

उन्होंने युवाओं की सराहना करते हुए कहा कि यदि उन्हें सही दिशा मिले, तो वे समाज में सकारात्मक परिवर्तन ला सकते हैं।

उन्होंने जल संरक्षण, प्राकृतिक खेती एवं समाज सेवा को अपनाने का आह्वान करते हुए कहा कि यदि जल का समुचित प्रबंधन किया जाए, तो क्षेत्र में समृद्धि और खुशहाली स्वतः आ जाएगी।

संकल्प, सेवा एवं साधना का संदेश
कार्यक्रम के अंत में सभी संत-महात्माओं एवं अतिथियों का आभार व्यक्त किया गया। श्रद्धालुओं ने धर्म, सेवा, संस्कार एवं पर्यावरण संरक्षण के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।

यह आयोजन समाज को नई दिशा प्रदान करने वाला एक प्रेरणास्रोत सिद्ध हुआ।

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